कल एक भुट्टे ने
जिस पर ढेर सारा नींबू लगा था
मुझसे पूछा-
’तुम मिस नहीं करते उसे?’
पास ही रेस्टोरेंट की कढ़ाई में उछलते
चिली पनीर ने भी
यही सवाल दागा.
देर रात..
खंडवा रोड और रिंग रोड ने
आसाराम बापू चौराहे पर मिलकर
किया कन्फर्म..
गायब हो तुम आजकल!
भँवरकुआँ का डोसे वाला
जाने क्यों बड़ा परेशान-सा है..
पी.वी.आर. और सेंट्रल वाले
समझ ही नहीं पा रहे
संडे सुबह के शो में
रौनक ना होने की वजह !
लाल बाल्टी की कचौरी
अब चटपटी नहीं होती..
गार्डन में आजकल
बेखौफ घूमते हैं छोटे बच्चे..
जानते हैं
दीदी नहीं आयेगी गाल तोड़ने !
कभी घूमते हुए
भूले से भी
ज़बान पर आ जाये
’उठें सब के कदम तारा रम पम पम’
तो बंद हो जाती है बाईक...
उदास होकर
करती है मुझसे वादा
कि गियर बदलते वक़्त
कभी नहीं करेगी तुम्हे परेशान..
उसॆ फिर सीखना है
तुमसे चलना !
पता है..
कुलचे वाली आँटी कहती थीं-
’वो लड़की नहीं आई..
जिसे होती थी
मेरे हाथ जलने की परवाह
चाहती थी जो खुद निकालना
गर्म तंदूर से कुलचे !’
पिछले हफ्ते
श्रेया घोषाल आई थी शहर में
आगे से दूसरी रो में
जाने क्या ढ़ूंढ़ती रही गाते वक़्त...
शो खत्म होने के बाद भी
देर तक किया उसने इंतज़ार
शायद.. मिलने आ जाये उससे
सबसे बड़ी फैन !
दोस्त..
उस रात की अधजली लकड़ियाँ
मौजूद हैं अभी तक छत पर
संभालकर रखा..
केक वाला प्लास्टिक का चाकू
बहुत मिस करता है तुम्हें..
एक थाली, पुलाव, फ्रूट रायता
और छह दोस्त..
सूखी आंखों से
कभी याद ही नहीं आते कम्बख्त!
खाने के शौकीन इन्दौरी
बहुत परेशान हैं.
गायब जो हो गयी है
सराफे से खुशबू..
वेज पुलाव और चिली पनीर
एकदम बेस्वाद हैं इन दिनों.
देखो..
वापस निकल आई है मेरी तोंद
सुबह पाँच बजे उठाकर
अब कोई नहीं ले जाता..
कसरत करवाने को रामबाग.
कुछ गड़बड़-सी है
मोबाईल में मेरे !
रात ग्यारह बजते ही
अपने-आप
डायल हो जाता है एक नम्बर..
काट दो अगर
तो देर तक रहता है उदास !
मेरा बर्थ डे
आया ही नहीं इस बार..
कह रहा था
‘सिर्फ नखराली में आउंगा’
मैनें गुस्से में कह दिया-
’मत आ !’
वादा लिया है उसने..
अब हर बर्थ डे
मुझे बंद रखना होगा
अपना मोबाईल.
ऐसा नहीं..
सिर्फ चीज़ें और इंसान ही परेशान हों
कल टेकरी वाली
बीजासन माता आईं थीं सपने में..
पूछ रहीं थी तुम्हारी खैर खबर.
दोस्त..
जितने प्यारे हैं तुम्हें गोल गप्पे
उससे कहीं ज्यादा प्यारी हो तुम मुझे.
खुश करना तुम्हें
गुब्बारे दिला देने जितना आसान है
और उदास करना
उन गुब्बारों को फोड़ देने जितना मुश्क़िल.
‘पगलू’ हो बिल्कुल..
तुम्हीं कर सकती हो मालगाड़ी को टाटा
तुम्हीं कर सकती हो सवाल
‘लड़कियों में क्या टापते हैं लड़के’
लगता है..
वक़्त ने माउस पकडकर
कंप्यूटर इमेज की तरह
ड्रैग करके
अचानक बड़ा कर दिया तुम्हें..
बचपन से बच्ची ही रही हो तुम.
तुम्हें पता नहीं..
अलविदा कहते वक़्त
मुझमें बो दी थी तुमने याद
अब हर बारिश के बाद
हरियाली की तरह आता है तुम्हारा खयाल.
तुम आईं थीं
एक पल की तरह..
जब गयीं
तो सदी की तरह रह गयीं..
दोस्त..
त्तुम मुझमें शामिल हो ऐसे
जैसे पानी में गीलापन,
आंखों में सपने
और माचिस में आग.
तुम नहीं..
तो एक खूबसूरत खाली
फोटो-फ़्रेम की तरह हूं मैं.
मैं हूं तो..
मगर मत समझा करो
मुझे बेवकूफ..
‘तुम चाँद हो मगर आसमान सबका है’
यह बात
मैं समझने लगा हूं अब.
उफ्फ..
धुंधले हो रहे हैं लफ्ज़ सारे
गीले हैं, काँप रहे हैं
काफी देर से जो डूबे हैं
आंखों के पानी में.
उखड़ रही है साँस इनकी..
यूं दम तोड़ते हुए
होंठ हिलाकर
बतला रहे हैं मुझे
अपनी आखिरी ख्वाहिश..
नब्ज़ थमने के पहले
इन्हे छूनी हैं तुम्हारी आंखें,
समझाने हैं तुम्हें अपने मायने
और कहना है तुम्हें
’आई मिस यू दोस्त!’