Monday, April 5, 2010

मुस्कुराहट

कई मुद्दतों बाद
एक दोस्त मिला आज
वो मुस्कुरा रहा था
मैं भी मुस्कुरा रहा था
हम दोनो मुस्कुरा रहे थे
मुस्कुरा रहे थे हम दोनो
यह जतलाने के लिये
कि देखो
मुस्कुरा रहे हैं हम!
अपनी मुस्कुराहट को मैं समझता था
मुस्कुराते हुये सोच रहा था
सोचते हुये डर रहा था
डरते हुये मुस्कुरा रहा था
और युं ही मुस्कुराते हुये
मुझे हुआ एक शुबहा..
कि मेरा दोस्त
कहीं सच में तो नहीं मुस्कुरा रहा !

Sunday, April 4, 2010

किताब की तरह

ज़िन्दा हूं ज़िन्दगी की लाश की तरह
दीमक से सजी इक किताब की तरह

मौत का सुर भी नहीं लगता ज़ालिम
मैं टूटा हुआ हूँ किसी साज़ की तरह

मुझ से नहीं मुझ पर दूसरो से खेलता है
चुपचाप बिछा रहता हूं बिसात की तरह

इक लफ्ज़ में उसको भला कैसे लिक्खें
दिल से जो निकले उसी काश की तरह

उस इंसान को देखा तो डर जाओगे
मेरे अन्दर छुपा है जो राज़ की तरह

मैं अच्छा भी हूँ तो क्या हरदम पहनेगा
वो दोस्त को समझता है लिबास की तरह

आओ दोस्त

आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें एक बार
जब जाना ही तो अलविदा कह लें ।
हाथों को छोडने से पहले,
कसकर थामें एक बार
जो भुलाये नहीं जा सकते वो गिले
तो याद करें लम्हे
जिनके होने से होता है हमें एहसास
कह सकते हैं हम
एक दूसरे को दोस्त।

देखो, बडी सर्द है रात
आओ हम सुलगायें
यादों का अलाव
सारे जज़्बातों को जलाकर
चलो ताप लें थोडा !

स्वीकारें..
कुछ गलत कर सकें हैं हम,
क्योंकि कभी सही भी तो थे !
आओ,
इस सही होने को सही करार दें
और गलत को,
गलत घोषित कर दें मिलकर।

आओ,
इस मुलाकात की गर्माहट देकर
सुखा लें आंसुओं में भीगी ज़िंदगी..
वरना गीली लकडी जब देखेगी आग
तो उठते धुएँ से
घुट जायेगा हम सबका दम।

हम स्कूल के बच्चों की तरह बैठें
खोलें अपने अतीत के टिफिन
फिर सबसे चखकर थोडा-थोडा
आज जी लें,
बीते लम्हों के ज़ायके।

जब मिलते हैं हम
तो वो नहीं होते ज़रूरी
यह बात कान व होंठों को समझा दें।
हम आंखों से बोलें,
आंखों से सुनें,
आंखों आंखों में ऐसे मुस्कुरायें..
गीली हो जाये आंखों की कोरें !
शायद तक़लीफ हो
पर आओ दोस्त,
हम आंखों में आंखें डालकर बात करें।

मिलकर गुनगुनायें वो प्यारा सा गीत
जो कहता है,
'कभी अलविदा ना कहना '
और गुनगुनाते हुए ही
हम कह दें अलविदा !
हम खुल कर हंसे..
ताकि हो सके रोने की तैयारी
और निकल जाये
आंसुऑं की नली में भरा
मजबूरियों का सारा कचरा ।

आज ज़ाया ना करें हम वक़्त
किसी भी उलझन को सुलझाने में
आओ,
कुछ और बढायें उलझनें..
सांसों को सांसों में उलझा लें,
आंखों को आंखों में उलझा लें,
यादों, वादों, सौगातों को
अहसासों और जज़्बातो
सारी बातों को..
हम मिलकर उलझा लें इस रात में
फिर इस उलझन की गठरी को
बन्द कर दें
दिल के ताले में
और चाबी तन्हाई को दे दें !


आओ,
थोडा जोखिम लें..
धडकनों की ना करें परवाह,
अपने हलक में डालकर हाथ
बाहर निकाल लें दिल
दिखलायें एक दूसरे को
कितने साफ हैं ये !

आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें..
कुछ कहने लगे खामोशी
तो कहने दें
तन्हाई करती हो शोर
तो करने दें
आकर गोद में सो जाये नींद
तो सोनें दें
मुस्कान अगर रोना चाहे
तो रोने दें
आंखो से बरसना ही हो सावन को
तो बरसने दें
ख्वाहिशों को तरसना ही हो अगर
तो तरसने दें

आज जो भी होना है
उसे होने दें..
और इस होने देने के लिये
आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें एक बार !