Monday, May 23, 2011

आई मिस यू दोस्त

कल एक भुट्टे ने

जिस पर ढेर सारा नींबू लगा था

मुझसे पूछा-

’तुम मिस नहीं करते उसे?’

पास ही रेस्टोरेंट की कढ़ाई में उछलते

चिली पनीर ने भी

यही सवाल दागा.

देर रात..

खंडवा रोड और रिंग रोड ने

आसाराम बापू चौराहे पर मिलकर

किया कन्फर्म..

गायब हो तुम आजकल!

भँवरकुआँ का डोसे वाला

जाने क्यों बड़ा परेशान-सा है..

पी.वी.आर. और सेंट्रल वाले

समझ ही नहीं पा रहे

संडे सुबह के शो में

रौनक ना होने की वजह !

लाल बाल्टी की कचौरी

अब चटपटी नहीं होती..

गार्डन में आजकल

बेखौफ घूमते हैं छोटे बच्चे..

जानते हैं

दीदी नहीं आयेगी गाल तोड़ने !

कभी घूमते हुए

भूले से भी

ज़बान पर आ जाये

’उठें सब के कदम तारा रम पम पम’

तो बंद हो जाती है बाईक...

उदास होकर

करती है मुझसे वादा

कि गियर बदलते वक़्त

कभी नहीं करेगी तुम्हे परेशान..

उसॆ फिर सीखना है

तुमसे चलना !

पता है..

कुलचे वाली आँटी कहती थीं-

’वो लड़की नहीं आई..

जिसे होती थी

मेरे हाथ जलने की परवाह

चाहती थी जो खुद निकालना

गर्म तंदूर से कुलचे !’

पिछले हफ्ते

श्रेया घोषाल आई थी शहर में

आगे से दूसरी रो में

जाने क्या ढ़ूंढ़ती रही गाते वक़्त...

शो खत्म होने के बाद भी

देर तक किया उसने इंतज़ार

शायद.. मिलने आ जाये उससे

सबसे बड़ी फैन !

दोस्त..

उस रात की अधजली लकड़ियाँ

मौजूद हैं अभी तक छत पर

संभालकर रखा..

केक वाला प्लास्टिक का चाकू

बहुत मिस करता है तुम्हें..

एक थाली, पुलाव, फ्रूट रायता

और छह दोस्त..

सूखी आंखों से

कभी याद ही नहीं आते कम्बख्त!

खाने के शौकीन इन्दौरी

बहुत परेशान हैं.

गायब जो हो गयी है

सराफे से खुशबू..

वेज पुलाव और चिली पनीर

एकदम बेस्वाद हैं इन दिनों.

देखो..

वापस निकल आई है मेरी तोंद

सुबह पाँच बजे उठाकर

अब कोई नहीं ले जाता..

कसरत करवाने को रामबाग.

कुछ गड़बड़-सी है

मोबाईल में मेरे !

रात ग्यारह बजते ही

अपने-आप

डायल हो जाता है एक नम्बर..

काट दो अगर

तो देर तक रहता है उदास !

मेरा बर्थ डे

आया ही नहीं इस बार..

कह रहा था

‘सिर्फ नखराली में आउंगा’

मैनें गुस्से में कह दिया-

’मत आ !’

वादा लिया है उसने..

अब हर बर्थ डे

मुझे बंद रखना होगा

अपना मोबाईल.

ऐसा नहीं..

सिर्फ चीज़ें और इंसान ही परेशान हों

कल टेकरी वाली

बीजासन माता आईं थीं सपने में..

पूछ रहीं थी तुम्हारी खैर खबर.

दोस्त..

जितने प्यारे हैं तुम्हें गोल गप्पे

उससे कहीं ज्यादा प्यारी हो तुम मुझे.

खुश करना तुम्हें

गुब्बारे दिला देने जितना आसान है

और उदास करना

उन गुब्बारों को फोड़ देने जितना मुश्क़िल.

‘पगलू’ हो बिल्कुल..

तुम्हीं कर सकती हो मालगाड़ी को टाटा

तुम्हीं कर सकती हो सवाल

‘लड़कियों में क्या टापते हैं लड़के’

लगता है..

वक़्त ने माउस पकडकर

कंप्यूटर इमेज की तरह

ड्रैग करके

अचानक बड़ा कर दिया तुम्हें..

बचपन से बच्ची ही रही हो तुम.

तुम्हें पता नहीं..

अलविदा कहते वक़्त

मुझमें बो दी थी तुमने याद

अब हर बारिश के बाद

हरियाली की तरह आता है तुम्हारा खयाल.

तुम आईं थीं

एक पल की तरह..

जब गयीं

तो सदी की तरह रह गयीं..

दोस्त..

त्तुम मुझमें शामिल हो ऐसे

जैसे पानी में गीलापन,

आंखों में सपने

और माचिस में आग.

तुम नहीं..

तो एक खूबसूरत खाली

फोटो-फ़्रेम की तरह हूं मैं.

मैं हूं तो..

मगर मत समझा करो

मुझे बेवकूफ..

‘तुम चाँद हो मगर आसमान सबका है’

यह बात

मैं समझने लगा हूं अब.

उफ्फ..

धुंधले हो रहे हैं लफ्ज़ सारे

गीले हैं, काँप रहे हैं

काफी देर से जो डूबे हैं

आंखों के पानी में.

उखड़ रही है साँस इनकी..

यूं दम तोड़ते हुए

होंठ हिलाकर

बतला रहे हैं मुझे

अपनी आखिरी ख्वाहिश..

नब्ज़ थमने के पहले

इन्हे छूनी हैं तुम्हारी आंखें,

समझाने हैं तुम्हें अपने मायने

और कहना है तुम्हें

आई मिस यू दोस्त!’


Friday, June 25, 2010

A Letter..

To,
My Friend Kriti and Neha.

Subject: Is there any need of subject when we say something to our Friend?

My Dear Friend,

‘You are my friend’ and that’s the only thing I know about you. In my exclusive dictionary ‘Life’ ‘Friendship’ and ‘you’ are synonyms. I don’t know actually what Friendship is but I am sure whatever it Is, its You!
Friend, when I am with You, I live many relations and lives. I am so powerless because I don’t know when and how to express. Usually people express their feelings through cards. As being your friend if I want to express my feelings for you then you have to receive a card on Raksha bandhan, Mother’s day, Father’s day, Grand parents day, Teacher’s day, Doctor’s day, Valentine’s day and if you want then on Friendship day also.
But I am thinking instead of these all days i should just write “Everyday”.

- Not Only Yours
Vipul
Date-17-6-2010

Monday, April 5, 2010

मुस्कुराहट

कई मुद्दतों बाद
एक दोस्त मिला आज
वो मुस्कुरा रहा था
मैं भी मुस्कुरा रहा था
हम दोनो मुस्कुरा रहे थे
मुस्कुरा रहे थे हम दोनो
यह जतलाने के लिये
कि देखो
मुस्कुरा रहे हैं हम!
अपनी मुस्कुराहट को मैं समझता था
मुस्कुराते हुये सोच रहा था
सोचते हुये डर रहा था
डरते हुये मुस्कुरा रहा था
और युं ही मुस्कुराते हुये
मुझे हुआ एक शुबहा..
कि मेरा दोस्त
कहीं सच में तो नहीं मुस्कुरा रहा !

Sunday, April 4, 2010

किताब की तरह

ज़िन्दा हूं ज़िन्दगी की लाश की तरह
दीमक से सजी इक किताब की तरह

मौत का सुर भी नहीं लगता ज़ालिम
मैं टूटा हुआ हूँ किसी साज़ की तरह

मुझ से नहीं मुझ पर दूसरो से खेलता है
चुपचाप बिछा रहता हूं बिसात की तरह

इक लफ्ज़ में उसको भला कैसे लिक्खें
दिल से जो निकले उसी काश की तरह

उस इंसान को देखा तो डर जाओगे
मेरे अन्दर छुपा है जो राज़ की तरह

मैं अच्छा भी हूँ तो क्या हरदम पहनेगा
वो दोस्त को समझता है लिबास की तरह

आओ दोस्त

आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें एक बार
जब जाना ही तो अलविदा कह लें ।
हाथों को छोडने से पहले,
कसकर थामें एक बार
जो भुलाये नहीं जा सकते वो गिले
तो याद करें लम्हे
जिनके होने से होता है हमें एहसास
कह सकते हैं हम
एक दूसरे को दोस्त।

देखो, बडी सर्द है रात
आओ हम सुलगायें
यादों का अलाव
सारे जज़्बातों को जलाकर
चलो ताप लें थोडा !

स्वीकारें..
कुछ गलत कर सकें हैं हम,
क्योंकि कभी सही भी तो थे !
आओ,
इस सही होने को सही करार दें
और गलत को,
गलत घोषित कर दें मिलकर।

आओ,
इस मुलाकात की गर्माहट देकर
सुखा लें आंसुओं में भीगी ज़िंदगी..
वरना गीली लकडी जब देखेगी आग
तो उठते धुएँ से
घुट जायेगा हम सबका दम।

हम स्कूल के बच्चों की तरह बैठें
खोलें अपने अतीत के टिफिन
फिर सबसे चखकर थोडा-थोडा
आज जी लें,
बीते लम्हों के ज़ायके।

जब मिलते हैं हम
तो वो नहीं होते ज़रूरी
यह बात कान व होंठों को समझा दें।
हम आंखों से बोलें,
आंखों से सुनें,
आंखों आंखों में ऐसे मुस्कुरायें..
गीली हो जाये आंखों की कोरें !
शायद तक़लीफ हो
पर आओ दोस्त,
हम आंखों में आंखें डालकर बात करें।

मिलकर गुनगुनायें वो प्यारा सा गीत
जो कहता है,
'कभी अलविदा ना कहना '
और गुनगुनाते हुए ही
हम कह दें अलविदा !
हम खुल कर हंसे..
ताकि हो सके रोने की तैयारी
और निकल जाये
आंसुऑं की नली में भरा
मजबूरियों का सारा कचरा ।

आज ज़ाया ना करें हम वक़्त
किसी भी उलझन को सुलझाने में
आओ,
कुछ और बढायें उलझनें..
सांसों को सांसों में उलझा लें,
आंखों को आंखों में उलझा लें,
यादों, वादों, सौगातों को
अहसासों और जज़्बातो
सारी बातों को..
हम मिलकर उलझा लें इस रात में
फिर इस उलझन की गठरी को
बन्द कर दें
दिल के ताले में
और चाबी तन्हाई को दे दें !


आओ,
थोडा जोखिम लें..
धडकनों की ना करें परवाह,
अपने हलक में डालकर हाथ
बाहर निकाल लें दिल
दिखलायें एक दूसरे को
कितने साफ हैं ये !

आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें..
कुछ कहने लगे खामोशी
तो कहने दें
तन्हाई करती हो शोर
तो करने दें
आकर गोद में सो जाये नींद
तो सोनें दें
मुस्कान अगर रोना चाहे
तो रोने दें
आंखो से बरसना ही हो सावन को
तो बरसने दें
ख्वाहिशों को तरसना ही हो अगर
तो तरसने दें

आज जो भी होना है
उसे होने दें..
और इस होने देने के लिये
आओ दोस्त,
हम मिलकर बैठें एक बार !