Sunday, April 4, 2010

किताब की तरह

ज़िन्दा हूं ज़िन्दगी की लाश की तरह
दीमक से सजी इक किताब की तरह

मौत का सुर भी नहीं लगता ज़ालिम
मैं टूटा हुआ हूँ किसी साज़ की तरह

मुझ से नहीं मुझ पर दूसरो से खेलता है
चुपचाप बिछा रहता हूं बिसात की तरह

इक लफ्ज़ में उसको भला कैसे लिक्खें
दिल से जो निकले उसी काश की तरह

उस इंसान को देखा तो डर जाओगे
मेरे अन्दर छुपा है जो राज़ की तरह

मैं अच्छा भी हूँ तो क्या हरदम पहनेगा
वो दोस्त को समझता है लिबास की तरह

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